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छतीसगढ़ सच 06/06/2021 :16:45
यूपी की सियासत और योगी के भविष्य पर सबसे सटीक आकलन जरूर पढ़ें..... योगी से किसको डर,क्या सचमुच हार की चिंता या योगी का कद बढ़ने की...
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दरअसल कोविड काल मे नाकामी की वजह से अगर मुख्यमंत्री बदला जाएगा तो शायद हर प्रदेश में ये जरूरत पड़ेगी। शायद ही कोई इस बात से इंकार करेगा कि कोविड को लेकर योगी से ज्यादा हमले प्रधानमंत्री पर हुए हैं। ये भी सच है कि इस मुद्दे ने पीएम योगी की लोकप्रियता पर भी असर डाला


अंजना शर्मा
उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को लेकर तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। बहुत सी बातें हो चुकी है। कहा जा रहा है कि योगी का नेतृत्व बरकरार रहा तो पार्टी की अगले चुनाव में जीत की संभावना धूमिल हो सकती है। कोविड काल मे नाकामी को वजह बताया जा रहा है। ब्यूरोक्रेसी के हावी होने और जनप्रतिनिधियों की बात न सुने जाने के आरोप मढ़ते हुए करीब 200 विधायको के नाराज होने की बात भी हो रही है। 
बात करते हैं तथ्यों की। जी हां ये सच है। नाराजगी है। विधायक नाराज हैं। जनता का एक वर्ग भी नाराज है। कोविड के महा चुनौती भरे दौर में नाकाम व्यवस्था बड़ी वजह है। खासतौर पर जिन्होंने त्रासदी को भुगता उनकी नाराजगी स्वाभाविक है। 
अस्पतालों की डांवाडोल स्थिति, ऑक्सीजन की मारामारी, बिना इलाज या अव्यवस्था की वजह से हुई मौतों ने योगी सरकार को बड़ी मुश्किल में डाला। लेकिन क्या इतना ही है जिसकी वजह से योगी को हटाकर किसी और को लाया जाए। या फिर कथित नाराजगी अंदर ही अंदर कई मुद्दों को लेकर पक रही थी और कोविड ने उसे बढ़ा दिया। ठाकुरवाद का आरोप। योगी का ब्यूरोक्रेसी पर जरूरत से ज्यादा भरोसा पहले से उनकी ही पार्टी में  लोगों को चुभता रहा है।
लेकिन विकल्प क्या हैं और क्या योगी को हटाने की चर्चा में दम है। दरअसल भाजपा और संघ दोनो को पता है कि योगी को अगर बनाये रखना चुनौती हो सकता है तो उन्हें हटाना उससे भी बडी चुनौती। योगी आदित्यनाथ हिंदुत्व का चेहरा बन चुके हैं। अभी से भाजपा की हिंदुत्ववादी छवि से प्रभावित समर्थकों का बड़ा समूह मोदी के बाद स्वाभाविक तौर पर योगी को नेता मानता है। अमित शाह ने धारा 370 और सीएए जैसे मुद्दों के जरिये अपनी जो छवि बनाई वह भी योगी के हिंदुत्ववादी छवि के मुकाबले कमतर हो जाती है।
अब यही पेंच है। दरअसल कोविड काल मे नाकामी की वजह से अगर मुख्यमंत्री बदला जाएगा तो शायद हर प्रदेश में ये जरूरत पड़ेगी। शायद ही कोई इस बात से इंकार करेगा कि कोविड को लेकर योगी से ज्यादा हमले प्रधानमंत्री पर हुए हैं। ये भी सच है कि इस मुद्दे ने पीएम योगी की लोकप्रियता पर भी असर डाला है। इसलिए कोविड की नाकामी नेतृत्व बदलने की वजह बनी तो बात दूर तलक जाएगी। लेकिन एक वजह जो इस तरह की चर्चाओं का पीछे है और जिसपर बहुत कम लोग बात कर रहे हैं वह है योगी की छवि और उनकी स्टाइल से भाजपा के अंदर ही महसूस किया जा रहा खतरा।जनता में हिंदुत्ववादी कट्टर छवि के नेता के रूप में उभरे योगी पार्टी में कइयों की आंख की किरकिरी हैं। दरअसल पार्टी और संघ में सबको पता है कि उत्तरप्रदेश में लगातार दूसरी जीत दर्ज करने के बाद योगी को हटाया जाना मुमकिन नही होगा। और अगर वे जीतकर दोबारा मुख्यमंत्री बने तो पीएम मोदी के बाद कौन की लिस्ट में वे सबसे ऊपर आ जाएंगे। मोदी के बाद शाह की सोच वाले समर्थक नेताओ को अगर ये खतरा लग रहा है तो खुद मोदी के इमेज मॅनेजर भी एक सीमा के बाद इस छवि को खुद मोदी के लिए बहुत मुफीद नही मानते। दूसरी बात जो इसी से जुड़ी है वह है योगी जी जी की स्टाइल। योगी अपने अंदाज में काम करते हैं। यही वजह है कि अगर केंद्र में मोदी के बाद कोई अन्य चेहरा उभर नही पाया तो योगी ने भी किसी अन्य मंत्री को ताकतवर नही होने दिया। यहां तक कि दो उप मुख्यमंत्रियों में ज्यादा सक्रिय रहे केशव मौर्य की भी प्रशासन में पकड़ नही बनी। उनके विभाग में भी वे पूरी तरह से अपनी नही चला पाए। कहा जाता है योगी इसी स्टाइल से पीएम मोदी की पसंद के रूप में भेजे गए ब्यूरोक्रेट से नेता बने ए के शर्मा से भी पेश आये। उन्होंने पहले उन्हें मुलाकात का वक्त नही दिया। फिर वक्त दिया भी तो उन्हें महत्वपूर्ण दायित्व देने में उनकी अनिच्छा सामने आ गई। ये बातें स्वाभाविक तौर पर उस नेतृत्व को अच्छी नही लग सकती जिसका इशारा भी आज की तारीख में बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए चर्चाएं तरह तरह की हो रही हैं। बिना आग के धुंआ नही उठता। आपको देखना चाहिए कि इन चर्चाओं को विराम देने की कोई गंभीर कोशिश भाजपा की ओर से नही हुई। यानी नेतृत्व न भी बदला जाए दबाव बनाने की कोशिश पूरी हो रही है। 
भाजपा के सामने कई सवाल है। क्या योगी को हटाने की ठोस वजह है जबकि वे उनके हिंदुत्ववादी एजेंडे पर काम कर रहे हैं। उनकी छवि पर कोई दाग नही है। दूसरा उनका कोई मज़बूत विकल्प है? 
क्या योगी को हटाया जाए तो भाजपा हिंदुत्व से हटकर अन्य मुद्दों पर चुनाव लड़ने की स्थिति में है। क्या उसके पास कोई वैकल्पिक मॉडल है? ज्यादातर सवालों के जवाब न में ही मिलेगा। और आखिर में एक बात और खुद भाजपा में सबको पता है कि योगी पहले भी पार्टी और संघ से कई बार टकराव मोल लेते रहे हैं हिन्दू युवा वाहिनी के जरिये। हालांकि खुद मुख्यमंत्री बनने के बाद इसकी सक्रियता कम हुई। लेकिन ये संकेत काफी है कि वे केवल इशारे पर काम करने वाले पार्टी के मजबूर त्रिवेंद्र सिंह रावत जैसे नेता नही हैं। वहां अगर कोई भी खलल होती है तो बहुत बड़ी उथलपुथल तय है।





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