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बस्तर न्यूज़
छतीसगढ़ सच 06/06/2021 :17:16
आदेश गुप्ता का आदेश कोई नही सुनता....
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भाजपा ने मोदी - शाह के स्वर्णिम दौर में देश के कई राज्यों में अपना दमखम दिखाया। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली दूर ही रही। इस दूरी की वजह क्या है। क्या भाजपा दिल्ली की नब्ज नही टटोल पा रही है।

दिल्ली खबर
भाजपा ने मोदी - शाह के स्वर्णिम दौर में देश के कई राज्यों में अपना दमखम दिखाया। लेकिन देश की राजधानी दिल्ली दूर ही रही। इस दूरी की वजह क्या है। क्या भाजपा दिल्ली की नब्ज नही टटोल पा रही है। या फिर उनकी रणनीति में कहीं खोट है। एक दौर था जब भाजपा में साहिब सिंह वर्मा, मदन लाल खुराना,डॉक्टर हर्षवर्धन, विजय प्रकाश मल्होत्रा,जगदीश मुखी यहां तक कि जेटली और सुषमा को भी दिल्ली की सियासत में गहरी दिलचस्पी की वजह से चेहरा माना जाता था। साहिब सिंह,खुराना और सुषमा तो दिल्ली के मुख्यमंत्री भी बने। कई और नामो की फेहरिस्त थी भाजपा के पास, जिनका कद आज के नेताओ से शायद कहीं बड़ा था। इन नेताओं ने अपने काम, लोगों से जुड़ाव,संवाद के तरीके से अपना बड़ा कद निर्मित किया था। लेकिन वक्त के साथ भाजपा में नेतृत्व का मानो टोटा सा पड़ गया।
 मोदी शाह ने जितने भी प्रयोग किरण बेदी से लेकर अब तक किये कोई भी दांव सटीक नही बैठा। हर्षवर्धन को किनारे कर बेदी को आगे करना भाजपा की बड़ी चूक साबित हुआ। मनोज तिवारी जैसे सेलिब्रिटी चेहरे पर भी दांव लगाया गया। पार्टी एमसीडी में तो जीत गई लेकिन विधानसभा में केजरीवाल के गढ़ में सेंध नही लगा सकी। लोकसभा में मोदी का नाम चला लेकिन उनके दिल्ली में किये गए प्रयोगों को लोगों ने नकार दिया।
अब अगले साल एमसीडी का चुनाव है तो बड़ा सवाल क्या पार्टी आदेश गुप्ता के नेतृत्व में अपना बर्चस्व बचा पाएगी। या दिल्ली की बची खुची आस भी जाने वाली है। आदेश गुप्ता दिल्ली के ही हैं। वैश्य समुदाय से आते हैं जिसका काफी बर्चस्व है। वे पार्षद रहे हैं। लेकिन उनका कद अध्यक्ष होने के बावजूद बड़ा नही हो पाया। मनोज तिवारी को कम से कम लोग जानते थे। भीड़ जुटाने की उनकी छमता भी बेजोड़ थी। एमसीडी उन्होंने जिताया और विधानसभा में मत प्रतिशत को कुछ हद तक बेहतर कर पाए। लेकिन आदेश गुप्ता को अपनी पहचान कायम करने में काफी वक्त लग रहा है। वे अच्छे वक्ता नही हैं। जनता में पैठ बनाने की जुगत है लेकिन खुद पार्टी में उनका आदेश ज्यादातर नेता नही मानते। ज्यादातर सांसद उन्हें अध्यक्ष की हैसियत जैसा सम्मान नही देते। मीडिया से भी वे अपना संवाद बेहतर नही बना पाए हैं। मुद्दों को लेकर लड़ने का उनका कौशल भी कठघरे में है। ऐसे में भाजपा की वैतरणी कैसे पार होगी ये सवाल भाजपा के समर्थकों को भी परेशान कर रहा है और उन नेताओ को भी जो दिल्ली से दिल लगाकर बैठे हैं।





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