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दो टूक
छतीसगढ़ सच 30/08/2021 :17:19
क्या राहुल गांधी को जमीनी नेता पसंद नही आते? क्या है राहुल का सियासी व्यक्तित्व? पड़ताल करती रिपोट
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पार्टी में लोकतंत्र की बात करने वाले राहुल गांधी ने क्या कांग्रेस को बंधक बना लिया है। क्या वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करके मां सोनिया गांधी पर दबाव बनाकर मनमाफिक फैसले करवाते हैं। क्या राहुल गांधी की टीम उन्हें गुमराह करती है? क्या अंग्रेजी बोलने वाले एलीट नेता ही राहुल गांधी को पसंद आते हैं। जमीनी नेताओ की कांग्रेस में कद्र कम हो गई है? ऐसे तमाम सवाल कांग्रेस पार्टी के भविष्य पर चिंता जताकर जी 23 का हिस्सा बने नेताओ से बातचीत के बाद उभरकर आते हैं।

Written by Anjana Sharma

पार्टी में लोकतंत्र की बात करने वाले राहुल गांधी ने क्या कांग्रेस को बंधक बना लिया है। क्या वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी करके मां सोनिया गांधी पर दबाव बनाकर मनमाफिक फैसले करवाते हैं। क्या राहुल गांधी की टीम उन्हें गुमराह करती है? क्या अंग्रेजी बोलने वाले एलीट नेता ही राहुल गांधी को पसंद आते हैं। जमीनी नेताओ की कांग्रेस में कद्र कम हो गई है? ऐसे तमाम सवाल कांग्रेस पार्टी के भविष्य पर चिंता जताकर जी 23 का हिस्सा बने नेताओ से बातचीत के बाद उभरकर आते हैं। 
एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि अच्छा होता राहुल गांधी ठेठ हिंदी पट्टी को समझने वाले मिट्टी से जुड़े कुछ लोगों को आसपास रखते। उनकी बात सुनते। समझने का प्रयास करते कि आखिर उनकी तमाम मेहनत के बाद भी गड़बड़ कहाँ हो रही है। क्यों ऐसे लोग पार्टी से दूर हो रहे हैं जो उनके लिए ही खुलकर बैटिंग करते रहे हैं। हर जगह पार्टी की स्थिति डांवाडोल क्यों है? जहां पर पार्टी अच्छी स्थिति है वहां भी भूचाल कौन और किसके इशारे पर खड़ा कर रहा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री पेशे से वकील कपिल सिब्बल इन सभी सवालों को तार्किक तरीके से लोगों के सामने रखते हैं। गुलाम नबी आजाद हों या मनीष तिवारी सबकी पीड़ा यही है कि पार्टी जमीन से कट रही है। नेतृत्व की अगर अपनी अपील नही है तो मजबूत टीम उसे मजबूत बनाती है। सोनिया गांधी उदाहरण है। उन्होंने कभी मनमाने फैसले नही किये। मजबूत टीम बनाई। वफादार, समझदार,दमदार टीम के जरिये खुद पार्टी की डूबती नाव को न सिर्फ बचाने बल्कि उसे अच्छी तरह से चलाकर किनारे तक पहुंचाने में कामयाब रहीं।
लेकिन पुत्रमोह उनकी कमजोरी साबित हुआ। जब से राहुल गांधी की पकड़ पार्टी में मजबूत हुई पुराने वफादार नेता किनारे जाने लगे। जिन्हें टीम राहुल के नाम पर तैयार किया गया। वे भी न अपने नेता को मजबूती दे पाए न खुद मजबूत बन पाए। हिमंता विश्व शर्मा जैसा मजबूत नेता पार्टी छोड़कर गया और आज असम के मुख्यमंत्री है। कांग्रेस को समझने वाले कहते हैं कि उनको संभालने और बात करने की जिम्मेदारी राहुल गांधी पर थी। लेकिन राहुल ने कभी उनसे कायदे से बात ही नही की।  ज्योतिरादित्य, प्रियंका चतुर्वेदी, सुष्मिता देव एक नही अनेक नाम हैं। जिन्होंने पार्टी नही छोड़ी वे अलग तरीको से किनारे हो गए जनार्दन द्विवेदी जैसा वफादार और गांधी परिवार का शुभचिंतक नेता आज कहाँ है। उनकी स्क्रिप्ट राहुल गांधी के लिए सबसे काम की हो सकती थी। दिग्विजय सिंह पार्टी में हैं लेकिन नेपथ्य में हैं। कमलनाथ दिल्ली नही आना चाहते। अशोक गहलोत राजस्थान में मुख्यमंत्री हैं लेकिन राहुल गांधी की रणनीति से खफा हैं। सचिन युवा हैं पार्टी से जाते जाते रह गए लेकिन उनकी भी नाराजगी राहुल गांधी के रणनीतिकारों से ही है। पंजाब में कैप्टन जैसा दमदार नेता आज केंद्रीय रणनीति से उलझा हुआ है। सबसे ताजा उदाहरण छत्तीसगढ़ है जहां कहा जाता है कि राहुल गांधी का एक ही आदमी जो मुख्यमंत्री है भुपेश बघेल वह भी टीम राहुल की अदूरदर्शिता भरी रणनीति से बेगाने से हो गए। जिस तरह की पटकथा टीम राहुल ने लिखी है छत्तीसगढ़ भी कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए नया डिजास्टर हो सकता है। सभी बड़े नेता हतप्रभ हैं। शायद सब इंतजार में हैं कि अपनी नाकामियों से ही नेतृत्व समझदार होगा या नए नेतृत्व का रास्ता तैयार होगा। फिलहाल हाल यही है अंधेर नगरी.....





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